

बात जब होली की आती है, तो बरसाना और ब्रज की पारंपरिक होली का जिक्र सबसे पहले आता है। कान्हा की धरती पर हर साल देश विदेश से आने वाले उनके भक्तों की खासी भीड़ जमा होती है और हर कोई पूरे हर्षोल्लास से इस पर्व में शामिल होता है। फिर चाहे वृंदावन की फूलों वाली होली हो या बरसाना की लट्ठमार होली या लड्डू से खेली जाने वाली होली। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस त्योहार को रंग गुलाल और लोकगीतों सहित पूरी उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस साल 4 मार्च को मनाए जाने वाले इस त्योहार को लेकर लोगों में खास उत्साह है। सबसे पहले जानते हैं कि होली (Holi) क्यों मनाई जाती है।
जानते हैं Holi क्यों मनाई जाती है
होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के अगले दिन सभी लोग पुराने गिले शिकवे भूलकर एक दूसरे के साथ मिल जुलकर होली मनाते हैं। असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे भक्त प्रह्लाद को अपनी बहन की गोद में बैठाकर अग्नि में प्रवेश करने को कहा। हांलाकि होलिका वरदान में मिली चुनरी ओढ़ कर अग्नि में बैठी थीं, मगर वो जलकर खाक हो गईं और विष्णु भक्त प्रह्लाद की जान बच गई थी। इस पारंपरिक कहानी के अलावा होली को भगवान कृष्ण और राधारानी के जीवन से जोड़कर भी देखा जाता है।
बरसाना की होली क्यों है खास
लट्ठमार होली
अगर बरसाना की बात करें, तो यहां की होली न केवल परंपरांगत है बल्कि राधा कृष्ण की प्रेम लीला का एक अनूठा उत्सव है। ऐसी मान्यता है कि यहां पर श्रीकृष्ण राधारानी और अपनी गापियों के साथ होली खेला करते थे। जहां फूलों की होली राधाकृष्ण के प्रेम को दर्शाती है। वहीं लट्ठमार होली हल्की और मीठी नोंक झोंक का प्रतीक हैं। लट्ठमार होली बरसाना की रंगीली गली में खेली जाती है। इसमें पारंपरिक गीतों और रंगों सहित बरसाना की औरतें नंदगार के आदमियों को लाठियों से मारती है। इसमें आदमियों को ढ़ाल से अपना बचाव करना होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान अगर कोई आदमी पकड़ा जाता है, तो उन्हें महिलाओं जैसे कपड़े पहनाए जाते हैं।
यह उत्सव दो दिनों तक चलता है और नदगांव के पुरूषों को होली खेलने के लिए बरसाना आना पड़ता है। यह केवल एक खेल मात्र होता है। इसमें शरारत के साथ प्रेम और अपनेपन की एक अनोखी झलक देखने को मिलती है।
राधारानी के मंदिर से उत्सव की शुरूआत की जाती है, जहां पुजारी जी देवी के चरणों में गुलाल अर्पित करते हैं। बरसाना की गलियों में भक्त आकर न केवल होली के रंग में रंग जाते हैं, बल्कि यहां मौजूद मंदिरों के दर्शन भी करते हैं। यहां मौजूद लाडली महल को बरसाना का हृदय माना जाता है और वहां तक पहुंचने के लिए 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यहां हर ओर राधे राधे की ही ध्वनि गूंजती है।
लड्डूमार होली
यहां की लड्डूमार होली भी बेहद प्रचलित है। लट्ठमार होली खेलने से पहले बरसाना में इससे एक दिन पहले लड्डूमार होली भी खेली जाती है। बरसाना के श्रीजी मंदिर में खेली जाने वाली इस होली में सभी लोग एक दूसरे पर लड्डू मारते हैं। इसमें देश विदेश से आए भक्त भी हिस्सा लेते है और अनूठे पल का लुत्फ उठाते हैं। यह उत्सव बंसत पंचमी से आरंभ हो जाता है, तो चालीस दिनों तक पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दौरान यहां की गलियों और चौपाल पर केवल भजन और राधे राधे की ही गूंज सुनाई देती है। होली का यह त्योहार प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस दौरान रंगों से खेलने के अलावा राधाकृष्ण की पूजा अर्चना और श्रृंगार भी किया जाता है। इस समय को राधारानी की कृपा पाने का मुख्य अवसर माना जाता है।
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